Karmic Story In Hindi – एक छोटे से पहाड़ी गाँव में रघुवीर नाम का एक आदमी रहता था। वह गाँव का सबसे अमीर व्यक्ति था, लेकिन दिल से बहुत कठोर और स्वार्थी था। गरीब लोग जब उससे मदद माँगते, तो वह मदद करने के बजाय उनसे ज्यादा ब्याज वसूलता और उनकी मजबूरी का फायदा उठाता। उसी गाँव में मोहन नाम का एक अनाथ लड़का भी रहता था, जो बहुत गरीब होने के बावजूद सबकी मदद करता था। वह बुजुर्गों के लिए लकड़ी लाता, बीमारों के लिए दवा लाता और बिना किसी उम्मीद के लोगों का सहारा बनता। गाँव वाले अक्सर कहते कि इतना भला लड़का भगवान का भेजा हुआ है। रघुवीर हमेशा मोहन का मज़ाक उड़ाता और कहता कि अच्छाई से पेट नहीं भरता। मोहन बस मुस्कुराकर कहता, “कर्म का फल जरूर मिलता है, बस समय लगता है।” रघुवीर उसकी बात सुनकर हँस देता, क्योंकि उसे अपने धन और ताकत पर बहुत घमंड था।
घमंड का बोझ और जीवन की पहली सीख
एक साल गाँव में भयंकर बारिश हुई और बाढ़ आ गई। कई घर बह गए, खेत नष्ट हो गए और लोग बेघर हो गए। रघुवीर का बड़ा मकान तो बच गया, लेकिन उसके सारे गोदाम और अनाज पानी में बह गए। अब वही लोग, जिनसे उसने कभी सहानुभूति नहीं दिखाई थी, उसकी मदद करने को तैयार नहीं थे। रघुवीर पहली बार खुद को अकेला महसूस करने लगा। दूसरी तरफ मोहन अपनी जान की परवाह किए बिना लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुँचा रहा था। उसने रघुवीर को भी घर से बाहर निकालकर सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया। रघुवीर शर्मिंदा था, क्योंकि जिसे वह तुच्छ समझता था, वही आज उसका सहारा बना था। उस रात उसने पहली बार महसूस किया कि पैसा सब कुछ नहीं होता। मन में पछतावा हुआ, पर अहंकार अभी पूरी तरह टूटा नहीं था।
समय का न्याय और बदलती सोच
कुछ दिनों बाद गाँव में बीमारी फैल गई। रघुवीर खुद भी गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। जिन लोगों से उसने कभी कठोर व्यवहार किया था, वे उससे दूर रहे। केवल मोहन ही रोज उसके लिए दवा और खाना लेकर आता रहा। कई रातों तक उसने जागकर रघुवीर की सेवा की। धीरे-धीरे रघुवीर ठीक होने लगा। अब उसका दिल बदल चुका था। उसने मोहन से पूछा, “मैंने तुम्हारे साथ कभी अच्छा व्यवहार नहीं किया, फिर भी तुम मेरी सेवा क्यों कर रहे हो?” मोहन ने शांत स्वर में कहा, “क्योंकि अच्छाई मेरा स्वभाव है, और कर्म का फल हर इंसान को मिलता है।” यह सुनकर रघुवीर की आँखों में आँसू आ गए। उसने पहली बार सच्ची कृतज्ञता महसूस की और समझ गया कि इंसान की पहचान उसके व्यवहार से होती है, न कि उसके धन से।
पछतावे से शुरू हुआ नया जीवन
ठीक होने के बाद रघुवीर ने अपने जीवन की दिशा बदलने का निर्णय लिया। उसने गाँव वालों को बुलाकर सबके सामने माफी माँगी। जिन लोगों से उसने ज्यादा ब्याज लिया था, उनका कर्ज माफ कर दिया और कुछ लोगों को आर्थिक सहायता भी दी। उसने अपने गोदाम की जगह एक छोटा स्कूल बनवाया, जहाँ गाँव के बच्चे मुफ्त पढ़ने लगे। धीरे-धीरे लोग उसे फिर से अपनाने लगे। अब वह हर काम से पहले सोचता कि इससे किसी का भला होगा या नहीं। मोहन को उसने अपने बेटे की तरह अपनाया, लेकिन मोहन ने कहा कि वह वही रहेगा जो पहले था, सबका साथी। रघुवीर को समझ आ गया कि सच्ची खुशी दूसरों के काम आने में है। उसका कठोर चेहरा अब शांत और संतुष्ट दिखने लगा था।
कर्म का सच्चा फल
कुछ वर्षों बाद गाँव खुशहाल हो गया। खेत लहलहाने लगे और स्कूल से पढ़े बच्चे शहरों में काम करने लगे। लोग अक्सर कहते कि यह बदलाव रघुवीर और मोहन की वजह से आया है। एक दिन रघुवीर ने मोहन से कहा, “तुम सही थे, कर्म का फल सच में मिलता है।” मोहन मुस्कुराया और बोला, “फल हमेशा मिलता है, बस देर होती है।” रघुवीर ने अपने जीवन में पहली बार सच्ची शांति महसूस की। अब उसे धन से ज्यादा संतोष की कीमत समझ आ चुकी थी। उसने जाना कि बुरे कर्म देर से सही, लेकिन दुख बनकर लौटते हैं और अच्छे कर्म सुख बनकर। यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है — इंसान जो बोता है, वही काटता है। इसलिए हमेशा अच्छा करना चाहिए, क्योंकि अंत में जीत अच्छाई की ही होती है।









